जन्मजात हृदय रोग के इलाज से पहले कौन-कौन सी जांच जरूरी होती हैं?
September 30, 2026 | Contributed by Rahul Ray

जन्मजात हृदय रोग बच्चों में पाए जाने वाले सबसे आम जन्मजात रोग में से एक है। यह बीमारी बच्चे के जन्म के समय ही मौजूद होती है और हृदय की संरचना या रक्त प्रवाह में किसी प्रकार की असामान्यता के कारण होती है। भारत सहित दुनिया भर में लाखों बच्चे हर वर्ष जन्मजात हृदय रोग के साथ जन्म लेते हैं। लेकिन समय पर रोग का पहचान और सही जांच के वजह से, बच्चे को उचित उपचार किया जाता है जिसके वजह से बच्चे को सामान्य और स्वस्थ जीवन मिल पता हैं।
माता-पिता तब चिंतित हो जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि उनके बच्चे के दिल में छेद है या हृदय से संबंधित कोई जन्मजात समस्या है। ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि इलाज या सर्जरी से पहले कौन-कौन सी जांचें आवश्यक होती हैं और उनका उद्देश्य क्या होता है।
इस ब्लॉग के माध्यम से हम जन्मजात हृदय रोग का इलाज, बच्चे के दिल में छेद के लक्षण, बच्चों के दिल में छेद के लक्षण और इलाज, से पहले की जाने वाली महत्वपूर्ण जांचो के बारे में विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
जन्मजात हृदय रोग क्या है?
जन्मजात हृदय रोग वह स्थिति है जिसमें बच्चे के जन्म के समय उसके हृदय की संरचना पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है। यह समस्या हृदय की दीवार, वाल्व, खून की नलियाँ या हृदय कक्षों में हो सकती है।
जैसे की –
- एट्रिअल सेप्टल डिफेक्ट
- वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट
- पेटेंट डक्टस आर्टेरिओसोस
- टेट्रालॉजी ऑफ़ फैलोट
- ट्रांस्पोसिशन ऑफ़ ग्रेट आर्टरीज
- पल्मोनरी स्टेनोसिस
- कोआर्कटेशनऑफ एओर्टा
इन सभी जन्मजात हृदय रोग का इलाज आज के समय में संभव है जन्मजात हृदय रोग का इलाज आज के समय में सफल पूर्वक दवा के माध्यम से , कैथेटर प्रक्रिया के माध्यम से या ओपन हार्ट सर्जरी के द्वारा किया जाता है।
जन्मजात हृदय रोग के कारण
कई मामलों में जन्मजात हृदय रोग का सटीक कारण पता नहीं चलता, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ जोखिम कारक इसकी संभावना बढ़ा सकते हैं। जैसे की –
- जेनेटिक कारण – यदि परिवार में पहले किसी सदस्य को जन्मजात हृदय रोग रहा है तो बच्चे में इसका जोखिम बढ़ सकता है।
- गर्भावस्था के दौरान संक्रमण – रूबेला जैसे संक्रमण बच्चे के दिल के विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
- माँ की स्वास्थ्य समस्याएं – डायबिटीज का ठीक से नियंत्रण न होना, हाई ब्लड प्रेशर
- कुछ दवाओं का सेवन – गर्भावस्था के दौरान कुछ दवाओं का असर बच्चे के दिल के विकास पर पड़ सकता है।
- धूम्रपान और शराब – गर्भावस्था के दौरान नशीले पदार्थ और शराब के सेवन से जन्मजात हृदय दोष का जोखिम बढ़ा सकता है।
बच्चे के दिल में छेद के लक्षण
दिल में छेद सामान्यतः एट्रिअल सेप्टल डिफेक्ट या वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट के कारण होता है। कुछ छोटे छेद बिना लक्षणों के भी हो सकते हैं जबकि बड़े छेद गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं। जैसे की –
- नवजातशिशुओं में लक्षण:-
- तेजीसे सांस लेना
- दूधपीते समय थकान
- पसीनाआना
- वजनन बढ़ना
- बार-बार निमोनिया या छाती में संक्रमण
- ऑक्सीजन स्तर कम होना
- त्वचा या होंठ नीले पड़ना
यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो तुरंत बाल हृदय रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।
जन्मजात हृदय रोग का इलाज
रोग का उपचार कई प्रकार से हो सकता है लेकिन कभी-कभी उसकी गंभीरता पर भी निर्भर करता है। जैसे की :-
- केवल निगरानी– कुछ छोटे एट्रिअल सेप्टल डिफेक्ट या वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट समय के साथ स्वयं बंद हो जाते हैं। ऐसे मामलों में नियमित जांच की जाती है।
- दवा उपचार– कुछ बच्चों को इन समस्याओं के लिए दवाएं दी जाती हैं-
- दिल को बेहतर तरीके से काम करने में मदद करने के लिए
- फेफड़ों में जमा तरल पदार्थ को कम करने के लिए
- ब्लडप्रेशर को नियंत्रित रखने के लिए
- कैथेटर आधारित उपचार – कुछ जन्मजात दोष बिना बड़ी सर्जरी के कैथेटर तकनीक के माध्यम से बंद किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए –
- एएसडी डिवाइस क्लोज़र
- पीडीए डिवाइस क्लोज़र
- ओपन हार्ट सर्जरी
कुछ गंभीर जन्मजात हृदय रोगों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। उदाहरण के लिए –
- दिल के छेद की सर्जरी
- जन्म से दिल में हुई बीमारी को ठीक करने की सर्जरी
- दिल के वाल्व की सर्जरी
इलाज से पहले जांच क्यों जरूरी होती हैं?
हर बच्चे के दिल की समस्या अलग होती है। इलाज शुरू करने से पहले डॉक्टर दिल की बनावट, खून का प्रवाह, ऑक्सीजन का स्तर और बच्चे की पूरी स्वास्थ्य स्थिति की जाँच करते हैं।
इसी उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण जांचें की जाती हैं। जैसे की –
- शारीरिक परीक्षण– यह बच्चे की जाँच का पहला कदम होता है।
- दिल की धड़कन
- फेफड़ों की स्थिति
- ऑक्सीजन स्तर
- ब्लड प्रेशर
- बच्चे का वजन और विकास
स्टेथोस्कोप से दिल की धड़कन और असामान्य आवाज़ की जाँच की जाती है।
- पल्स ऑक्सीमीटर टेस्ट – यह एक सरल और दर्द रहित जांच है।
उद्देश्य:
- खून में ऑक्सीजन का स्तर मापना
- दिल की बीमारी के कारण शरीर में ऑक्सीजन की कमी का पता लगाना
इस परीक्षण में बच्चे की उंगली या पैर की अंगुली पर एक छोटा सेंसर लगाया जाता है।
- छाती का एक्स–रे – यह जांच हृदय और फेफड़ों की स्थिति को समझने में मदद करती है।
इससे पता चलता है:
- दिल का आकार देखना
- फेफड़ों में खून का प्रवाह देखना
- फेफड़ों में तरल पदार्थ जमा है या नहीं, यह देखना
- इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम– ईसीजी दिल की धड़कन और उसकी विद्युत गतिविधि की जाँच करता है।
इससे पता चलता है:
- दिल की धड़कन की गति
- दिल की धड़कन की लय
- दिल के किसी हिस्से का बढ़ना
- दिल की विद्युत गतिविधि में गड़बड़ी
यह परीक्षण केवल कुछ मिनटों में पूरा हो जाता है।
- इकोकार्डियोग्राफी– यह जन्मजात हृदय रोग का पता लगाने के लिए एक महत्वपूर्ण जाँच है।
इको में अल्ट्रासाउंड तकनीक का उपयोग होता है।
इकोकार्डियोग्राफी से पता चलता है:
- दिल में छेद कहाँ है
- छेद कितना बड़ा है
- खून किस दिशा में बह रहा है
- दिल के वाल्व की स्थिति
- दिल कितनी अच्छी तरह खून पंप कर रहा है
ज्यादातर बच्चों में इको से दिल की बीमारी का पता चल जाता है।
- कलरडॉप्लरजाँच – यह इको की एक बेहतर जाँच है।
इससे डॉक्टर देख सकते हैं:
- खून किस दिशा में बह रहा है
- खून कितनी मात्रा में बह रहा है
- दिल में कहीं खून का रिसाव तो नहीं है और कितना है
यह सर्जरी की योजना बनाने में डॉक्टरों के लिए बहुत मददगार होती है
- रक्त जांच– इलाज या सर्जरी से पहले कई प्रकार की रक्त जांच की जाती हैं।
- हीमोग्लोबिन का स्तर
- संक्रमण की जाँच
- प्लेटलेट की संख्या
- ब्लड ग्रुप की जाँच
यदि रक्त की आवश्यकता हो तो व्यवस्था आसान होती है।
लिवर की जाँच – लिवर की स्थिति की जाँच
किडनी की जाँच – गुर्दे ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी जाँच।
रक्त जमने की जाँच – खून के सही तरीके से जमने की जाँच।
- कार्डियक कैथेटराइजेशन– सभी बच्चों को इसकी आवश्यकता नहीं होती।
डॉक्टर इसे तब सलाह देते हैं जब:
- जब बीमारी जटिल हो
- फेफड़ों में रक्तचाप की सही जाँच करनी हो
- सर्जरी की योजना बनानी हो
इस प्रक्रिया में एक पतली ट्यूब रक्त वाहिका के माध्यम से हृदय तक पहुंचाई जाती है।
- सीटी एंजियोग्राफी– कुछ जटिल मामलों में सीटी स्कैन और एंजियोग्राफी जैसी जाँच की जाती हैं।
इससे स्पष्ट जानकारी मिलती है:
- रक्तवाहिकाओं की बनावट
- जन्मसे मौजूद असामान्यताएँ
- सर्जरीकी योजना
- कार्डियक एमआरआई– इससे दिल की बहुत साफ़ और विस्तृत तस्वीरें मिलती हैं।
एमआरआई से क्या पता चलता है:-
- दिल की बनावट
- खून का प्रवाह
- दिल कैसे काम कर रहा है
यह खासकर जटिल जन्मजात हृदय रोगों में बहुत उपयोगी होती है
- फेफड़ों की जांच – कुछ बच्चों में फेफड़ों की स्थिति जानने हेतु अतिरिक्त परीक्षण किए जाते हैं।
उद्देश्य:
- सर्जरी का जोखिम कम करना
- रिकवरी की योजना बनाना
- बेहोशी की दवा से पहले जाँच – अगर बच्चे की सर्जरी होनी है, तो बेहोशी की दवा देने से पहले विशेषज्ञ डॉक्टर बच्चे की पूरी जाँच करते हैं।
इसमें देखा जाता है:
- सांस लेने की स्थिति
- किसी दवा से एलर्जी है या नहीं
- पहले से कोई बीमारी या स्वास्थ्य समस्या
- सर्जरी के दौरान होने वाले संभावित जोखिम
सर्जरी से पहले माता-पिता को क्या तैयारी करनी चाहिए?
- बच्चे के खान-पान का ध्यान रखें
- बच्चे को पौष्टिक और संतुलित आहार दें
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार सप्लीमेंट दें
- बच्चे को संक्रमण से बचाएं
- साफ-सफाई का ध्यान रखें
- टीके समय पर लगवाएं
बच्चे की सभी मेडिकल रिपोर्ट तैयार रखें
- इको रिपोर्ट
- ईसीजी रिपोर्ट
- खून की जाँच की रिपोर्ट
- एक्स-रे रिपोर्ट
- डॉक्टर की सलाह का पालन करें
- डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा अचानक बंद न करें।
इलाज के बाद फॉलो-अप क्यों जरूरी है?
जन्मजात हृदय रोग का इलाज के बाद भी बच्चे की नियमित जाँच जरूरी होती है।
इससे:
- दिल की कार्यक्षमता की जाँच होती रहती है
- संक्रमण और अन्य समस्याओं का समय पर पता चलता है
- आगे होने वाली जटिलताओं को समय पर पहचाना जा सकता है
क्या हर दिल के छेद की सर्जरी जरूरी होती है?
नहीं, कुछ छोटे छेद समय के साथ-साथ अपने आप बंद हो जाते हैं।
डॉक्टर किन बातों को देखकर फैसला लेते हैं?
- दिल में छेद कितना बड़ा है
- बच्चे की उम्र
- बच्चे को कितनी परेशानी हो रही है
- दिल पर इसका कितना असर पड़ रहा है
इसीलिए विशेषज्ञ की सलाह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष

आज चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण जन्मजात हृदय रोग का इलाज काफी हद तक संभव है। बच्चे के दिल में छेद हो, वाल्व की समस्या हो या जन्म से जुड़ी कोई जटिल हृदय बीमारी, समय पर जाँच और सही इलाज से बच्चे के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
इको, ईसीजी, एक्स-रे, खून की जाँच, कार्डियक कैथेटराइजेशन, सीटी एंजियोग्राफी और एमआरआई जैसी जाँचों से डॉक्टर बच्चे के दिल की समस्या को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। इन जाँचों के आधार पर बच्चे के लिए उचित इलाज की योजना बनाई जाती है।
अगर बच्चे को बार-बार सांस फूलना, वजन न बढ़ना, बार-बार संक्रमण होना या होंठ नीले पड़ना जैसी समस्या हो, तो बाल हृदय रोग विशेषज्ञ से सलाह लें। समय पर जाँच और इलाज से बच्चे के स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
अधिक जानकारी के लिएआप हमसे संपर्क कर सकते है :-
वेबसाइट – https://www.genesis-foundation.net/
मोबाइल नंबर – 9650603438
FAQs
बच्चे के दिल में छेद के लक्षण क्या होते हैं?
बच्चे के दिल में छेद के लक्षण में तेजी से सांस लेना, दूध पीते समय थकना, वजन न बढ़ना, जल्दी थक जाना और बार-बार छाती में संक्रमण होना शामिल हो सकता है। कुछ छोटे छेद में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते।
बच्चों के दिल में छेद के लक्षण और इलाज क्या हैं?
बच्चों के दिल में छेद के लक्षण और इलाज छेद के आकार, उसकी स्थिति और बच्चे के हृदय पर पड़ने वाले प्रभाव पर निर्भर करते हैं। इलाज में नियमित निगरानी, दवाएं, कैथेटर प्रक्रिया या सर्जरी शामिल हो सकती है।
जन्मजात हृदय रोग का इलाज कैसे किया जाता है?
जन्मजात हृदय रोग का इलाज बच्चे की बीमारी के प्रकार और गंभीरता के आधार पर किया जाता है कुछ बच्चों को केवल निगरानी या दवाओं की आवश्यकता होती है, जबकि कुछ मामलों में कैथेटर प्रक्रिया या सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
