एक बहादुर की कहानी: 3 साल के बचे की झारखंड से कोच्चि तक जीवन रक्षक उपचार की कहानी - Blog

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एक बहादुर की कहानी: 3 साल के बचे की झारखंड से कोच्चि तक जीवन रक्षक उपचार की कहानी

November 30, 2023 | Contributed by Rahul Ray

ये कहानी हैं झारखंड राज्य के एक छोटे से जिला की, जहां पर एक परिवार ( दादी, मम्मी , पापा, एक छोटा भाई, पति – पत्नी, एक 3 महीने की बेटी और 3 साल का एक बेटा) रहते है। घर का बड़ा बेटा राहुल (उर्फ नाम)  मजदूरी करके 250 से 300 कमा के अपने घर का पालन पोषण करता है।

 आज से तीन साल पहले राहुल अपनी जिंदगी में बहुत खुश था। उसको कभी महसूस ही नही हुआ की भविष्य में उसको कोई बड़ी दिक्कत होगी। लेकिन देखते ही देखते राहुल के उपर के बड़ी संकट आ गया ।उसका बेटा हर्षित (उर्फ नाम) जब 6 महीने का हुआ तो मां का स्तनपान करते हुए उसके सिर पर पसीना आने लगा और लंबी लंबी सांसे लेने गया। 6 महीने के बाद परिवार वालो को इस बात को लेके चिंता होने लगा। राहुल ने कुछ पैसे की व्यस्था की और अपने जिला के सरकारी अस्पताल में लेके गए। वहा पर डॉक्टर ने बच्चे का चेक-अप करने के बाद परिवार वालो को बोला की बच्चे को गैस की परेशानी है।
एक गहरा सदमाडॉक्टर ने कुछ दवाई दी और परिवार को घर जाने को बोला दिया लेकिन बच्चे की तबीयत में कोई सुधार नहीं आया। फिर से राहुल ने कुछ पैसे उधार लेके हर्षित को बिहार राज्य के भागलपुर जिला में एक प्राइवेट अस्पताल में दिखाने चले गए। वहा पर डॉक्टर ने बयाता के ये दिल में छेद होने के लक्षण है । हर्षित का ईको (ECHO) किया गया। ईको की जांच होने के बाद डॉक्टर ने परिवार वालो को बताया की बच्चे के दिल में छेद है। डॉक्टर ने बताया इलाज बहुत महंगा होगा और इलाज के लिए बंगलौर जाना पड़ेगा। डॉक्टर ने बोला की दिल का इलाज सबसे अच्छा  बंगलौर में ही होता है। ये सारी बात सुन कर हर्षित के परिवार को बहुत ही बड़ा धक्का लगा क्योंकि खर्चा बहुत थi। राहुल कुछ दिनों तक बहुत परेशान रहे और पैसों की यवस्था कैसे हो सके इसके बारे में सोचते रहे। अन्होने ने ये भी सोचा की जन्मजात ह्रदय रोग के कारण क्या होते हैं ।

एक दिन गांव के लोगो ने राहुल को रायपुर में स्थित एक अस्पताल के बारे  बताया । वहा डॉक्टर ने बच्चे का फिर से ईको किया। ईको रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर ने हर्षित का ऑपरेशन करने के लिए बोला। परिवार वाले एक मिनट के लिए खुश हो गए , उनको लगा अब हमारे बच्चे का इलाज हो जायेगा। लेकिन जब डॉक्टर ने परिवार वालो को समझाया कि बच्चे के ऑपरेशन करने के लिए बच्चे का वजन कम से कम 10 किलो वजन होना जरूरी। उस समय हर्षित का वजन 5 से 6 किलो था। दिल में छेद होने के कारण हर्षित का वजन बड़ नही रहा था। हर्षित का वजन बढ़ाने के लिए पूरे परिवार वालो ने खूब मेहनत किया । हर्षित का वजन बढ़ने में 2 साल लग गए। लेकिन इन 2 सालो मे हर्षित का तबीयत और बिगड़ गयी थी। परिवार वालो ने हर्षित का ऑपरेशन करने के लिए दोबारा रायपुर गए। । क्योंकि हर्षित की तबीयत इतना बिगड़ गया था की उसको ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत पड़ने लगी। लेकिन कुछ कारणों के लिए उसका इलाज वहां नहीं हो पाया।

“कहते हैं ना की भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती लेकिन उसका असर दिखता है”

राहुल के परिवार को बैंक से 1,00,000 रूपये का लोन पास हो गया अगले दिन ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए। हर्षित का सर्जरी करने के लिए 1 महीने का वेटिंग करने पड़ेगा। परिवार वाले हर्षित को देख कर रोने लगे। क्योंकि हर्षित की तबीयत धीरे धीरे और बिगड़ने लगा। हर्षित का परिवार थक हार के अपने गांव आ गए। गांव पहुंचने के बाद हर्षित की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। दिल में छेद होने के लक्षण बिगड गए।

ज्यादा ट्रेवलिंग करने के कारण हर्षित की बीमारी 80% कॉम्प्लीकेशन हो गया। जिसके कारण उसको ऑक्सीजन सिलेंडर में रहने को मजबूर हो गया।

इसी बीच हर्षित के परिवार ने और बहुत जगह इलाज के लिए कोशिश की लेकिन हर जगह उनके द्वार बंद मिले

सूर्य के प्रकाश की किरण

” कहते है की जाको राखे साइया, मार सके ना कोई”

हर्षित के पिता को पता चला की इंडिया में ऐसी भी संस्थाएं है जो गरीबों का फ्री में इलाज करवाती है। ये सुनकर हर्षित के पिता ने गूगल में दिल के इलाज के लिए एनजीओ सर्च किया। गूगल ने सबसे पहले जेनेसिस फाउंडेशन का नाम दिखाया। हर्षित के पिता ने जेनेसिस फाउंडेशन को कॉन्टैक्ट किया। जेनेसिस फाउंडेशन ने अपने हॉस्पिटल पार्टनर को तुरंत ये सारी रिपोर्ट्स भेज दिया। जेनेसिस फाउंडेशन ने बच्चे की रिपोर्ट्स को अमृता हॉस्पिटल कोच्चि में भेजा । वहा के डॉक्टर बच्चे का केस लिया।

झारखंड से कोच्चि 2800 किलोमीटर के आस पास पड़ता है। हर्षित के पिता ने कुछ देर सोचा। और सोचने के बाद उन्होंने जेनेसिस फाउंडेशन को कॉल किया और बोला इतनी बड़ी मुसीबत में मुझे किसी का साथ नही मिला पाया । मैं अपने बच्चे को एक एक दिन तड़पते हुए देख रहा हु। हर्षित के पिता ने मार्केट में जाके 2 बड़ा ऑक्सिजन सिलेंडर किराए पर ले लिया और 21 अक्टूबर 2023 को रात के 11 bje रेलवे स्टेशन में जाके रिजर्वेशन काउंटर में खड़े हो गए। क्योंकि पटना से एर्नाकुलम के लिए हफ्ते में सिर्फ 2 दिन ही ट्रेन चलती है। ट्रेन से पटना से एर्नाकुलम 44 घंटे का रास्ता है।  हर्षित के पिता रात को 11 बजे से रिजर्वेशन काउंटर पर खड़े हो गए और  सुबह 10 बजे उनको कन्फर्म टिकट मिला।

” बच्चे के लिए माता पिता क्या क्या नहीं करते” ये तो सिर्फ टिकट था।

अगले दिन 2 ऑक्सिजन सिलेंडर, 3 साल का हर्षित और 3 महीने की छोटी सी बच्ची और छोटा भाई ऑक्सिजन सिलेंडर को संभालें के लिए। इधर जेनेसिस फाउंडेशन के टीम मेंबर भी हर्षित के परिवार वालो को बीच बीच में फोन करके बच्चे का हाल चाल ले रहे थे। सबके मन मे बस यही लग रहा था की बच्चा कितना जल्दी कोच्चि हॉस्पिटल में पहुंच जाए। सब लोग हर्षित के लिए प्रार्थना कर रहे थे। 2 ऑक्सिजन सिलेंडर 44 घंटे का रास्ता, 2 छोटे बच्चे ये समय ऐसा था कि पूरा फोकस बस हर्षित के परिवार पर ही था। अमृता हॉस्पिटल ने परिवार वालो  को रेलवे स्टेशन से पिक करने के लिए एंबुलेंस को प्लेटफार्म के पास ही खड़ा करा दिया। वैसे ही हॉस्पिटल के स्टाफ ने मदद किया। फटाफट बच्चे और परिवार को एम्बुलेंस में बैठाया और सीधे अमृता हॉस्पिटल ले कर पहुंचे। हॉस्पिटल में डॉक्टर कृष्ण कुमार बच्चे को इमरजेंसी सर्जरी के लिए ले कर चले गए। हर्षित को 2 सर्जरी की ज़रूरत थी। पहला सर्जरी हर्षित को स्टेबल करने के लिए किया गया। हर्षित के लंग्स में एक वाल ब्लॉक था जिसने वजह से हर्षित बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के सांस नही ले पा रहा था। डॉक्टर ने उसके वाल को खोला दिया । फिर ब्लड धीरे धीरे लंग्स में फैलना शुरू हो गया । डॉक्टर ने  हर्षित को 2 दिन तक आईसीयू में रखा।  2 दिन के बाद जब हर्षित को होश में लाया गया और परिवार वालो से मिलाया गया तो पूरे परिवार से चेहरे से खुशी के मारे आंसु आने लगे। हर्षित के पिता ने जेनेसिस फाउंडेशन को कॉल किया और हस्ते हुए धन्यवाद किया। जेनेसिस फाउंडेशन हर्षित और उसके परिवार को तहे दिल से बधाई देता है और हर्षित के लंबी आयु का भी कामना करता है।  अगर आप कुछ ऐसे ही बच्चों को जानते हैं जिन्हें दिल के रोग के इलाज के लिए सहायता चाहिए तो उन्हें + 91 9650603438 फोन करने के लिए बोलें ।

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